ब्‍याज माफ करने से बैंकों पर पड़ेगा 2 लाख करोड़ का बोझ


भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह साफ कर दिया है कि सरकार की घोषणा के मुताबिक वह सावधि कर्ज की मासिक किस्तों में सिर्फ मूलधन की राशि की अदायगी में राहत देने की स्थिति में है। केंद्रीय बैंक के मुताबिक ग्राहकों को ब्याज अदायगी में कोई छूट नहीं दी जा सकती। वैसे वित्त मंत्रालय और आरबीआइ ने इस बारे में पहले ही स्पष्टीकरण दे दिया था कि सिर्फ मूलधन की अदायगी की अवधि बढ़ाई जा रही है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट में मामला दायर किये जाने पर केंद्रीय बैंक को फिर स्थिति स्पष्ट करनी पड़ी है। RBI ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि 6 महीने के लिए लोन का ब्‍याज माफ करने से बैंकों पर 2 लाख करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा। 


आरबीआइ ने सबसे पहले 27 मार्च को तीन महीने के लिए सावधि कर्ज के भुगतान में तीन महीने के लिए राहत देने का एलान किया था। उसके बाद 22 जून को दोबारा तीन महीने के लिए राहत देने की घोषणा की गई। इस तरह से सावधि कर्ज लेने वाले ग्राहकों को 1 मार्च से लेकर 31 अगस्त 2020 तक के लिए कर्ज चुकाने से राहत दी गई है। हालांकि इसका फायदा उठाने वाले ग्राहकों के लोन की अवधि छह महीने बढ़ जाएगी। आरबीआइ ने इस फैसले को लागू करने की जिम्मेदारी बैंकों पर छोड़ रखी है और बैंकों के अपने नियम खासे पेचीदे हैं।


गजेंद्र शर्मा नाम के एक व्यक्ति ने सुप्रीम कोर्ट में मामला दायर किया था कि ब्याज दरों में राहत दिए बगैर इस स्कीम का कोई फायदा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय बैंक से पूछा था कि उसकी राहत स्कीम में ब्याज दरों को माफ करने को शामिल क्यों नहीं किया गया है। केंद्रीय बैंक ने कहा है कि ब्याज दरों में राहत देने का मतलब होगा बैंकों के फाइनेंशियल हेल्थ और वित्तीय स्थायित्व के साथ समझौता करना। अगर छह महीने के लिए ब्याज दरों को माफ किया जाए तो बैंकों पर दो लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। इसके साथ ही यह बैंक में रकम जमा कराने वाले ग्राहकों के हितों को भी नुकसान पहुंचाएगा। कर्ज पर जो ब्याज लिया जाता है, वह बैंकों के राजस्व का बड़ा स्रोत है। यह बैंकिंग व्यवस्था को चलाने में काम आता है।